132 साल पुरानी परंपरा के साथ मनाया गया नेत्रोत्सव, भगवान को चढ़े चांदी के मुकुट
नेत्रोत्सव पर सुंदरगढ़ के श्रद्धालुओं की विशेष भेंट, भगवान जगन्नाथ को चढ़े चांदी के मुकुट और स्वर्ण आभूषण

जशपुर। आस्था, श्रद्धा और सनातन परंपरा का प्रतीक भगवान श्रीजगन्नाथ का पावन नेत्रोत्सव मंगलवार को क्षेत्र के विभिन्न जगन्नाथ मंदिरों—अंकिरा, कोल्हेनझरिया, लावाकेरा, तामामुण्डा, तपकरा एवं जरोण्डाझरिया—में धार्मिक रीति-रिवाजों एवं वैदिक मंत्रोच्चार के बीच श्रद्धापूर्वक संपन्न हुआ। इस अवसर पर भगवान श्रीजगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र एवं माता सुभद्रा को नेत्र प्रदान कर उनका भव्य अंतिम श्रृंगार किया गया। 13 दिनों के अनवसर (विश्राम) काल के बाद भगवान के प्रथम दर्शन के लिए सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ मंदिरों में उमड़ पड़ी।कार्यक्रम का शुभारंभ पंडित लक्ष्मण षड़ंगी द्वारा विधिवत पूजा-अर्चना एवं वैदिक मंत्रोच्चार के साथ किया गया। परंपरा के अनुसार गांव के गंझु परिवार के एक सदस्य ने गजपति महाराज की भूमिका निभाई। जगन्नाथ परंपरा में गंझु परिवार की विशेष धार्मिक मान्यता है। भगवान को रथ पर विराजमान कराने से लेकर रथयात्रा की व्यवस्थाओं तक इस परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।धार्मिक मान्यता के अनुसार ज्येष्ठ पूर्णिमा को भगवान का शाही स्नान कराया जाता है। इसके बाद भगवान श्रीजगन्नाथ, बलभद्र एवं माता सुभद्रा को अस्वस्थ मानते हुए 13 दिनों तक अनवसर काल में रखा जाता है। इस दौरान मंदिर के पट श्रद्धालुओं के लिए बंद रहते हैं तथा भगवान का औषधीय उपचार, विशेष स्नान और श्रृंगार किया जाता है। मंगलवार को नेत्रोत्सव के अवसर पर भगवान को नेत्र प्रदान कर उनका दिव्य श्रृंगार किया गया, जिसके बाद 13 दिनों के इंतजार के बाद श्रद्धालुओं को जगत के पालनहार भगवान श्रीजगन्नाथ, बलभद्र एवं माता सुभद्रा के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। दर्शन के लिए सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं। भक्तों ने पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि, क्षेत्र की खुशहाली एवं विश्व कल्याण की कामना की।इस वर्ष नेत्रोत्सव के दौरान ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले से पहुंचे लक्ष्मी डनसेना एवं उनके परिवार ने भगवान श्रीजगन्नाथ और बलभद्र के लिए चांदी के मुकुट, माता सुभद्रा के लिए सोने का माथा मड़ी, साथ ही चांदी की थाली एवं गिलास श्रद्धापूर्वक अर्पित किए। गांव की कीर्तन मंडली ने उनका भव्य स्वागत किया और भजन-कीर्तन के साथ शोभायात्रा निकालते हुए मंदिर तक पहुंचाया, जहां विधिवत पूजा के बाद सभी आभूषण भगवान को समर्पित किए गए।नेत्रोत्सव के उपरांत भगवान को विशेष महाभोग अर्पित किया गया। इसके बाद अंकिरा जगन्नाथ मंदिर परिसर में विशाल भंडारे का आयोजन हुआ, जिसमें क्षेत्र के दर्जनों गांवों से पहुंचे हजारों श्रद्धालुओं ने महाप्रसाद ग्रहण किया। पूरे मंदिर परिसर में “जय जगन्नाथ” के जयघोष से वातावरण भक्तिमय बना रहा।धार्मिक परंपरा के अनुसार अब गुरुवार को भगवान श्रीजगन्नाथ, बलभद्र एवं माता सुभद्रा भव्य रथ पर आरूढ़ होकर मौसी मां के घर के लिए रथयात्रा पर प्रस्थान करेंगे। वहां एक सप्ताह विश्राम के बाद दशमी तिथि को बहुदा यात्रा के माध्यम से भगवान पुनः अपने मूल मंदिर में विराजमान होंगे।आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से पूर्णिमा तक पूरे अंचल के गांवों में रथयात्रा का आयोजन किया जाएगा। इसके लिए रथ निर्माण, मंदिरों की सजावट, सांस्कृतिक कार्यक्रमों एवं मेले की तैयारियां अंतिम चरण में हैं।अंकिरा का श्रीजगन्नाथ मंदिर अपनी 132 वर्ष पुरानी गौरवशाली परंपरा के लिए पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध है। यहां प्रतिवर्ष नेत्रोत्सव एवं रथयात्रा में छत्तीसगढ़ और ओडिशा सहित आसपास के दर्जनों गांवों से हजारों श्रद्धालु शामिल होकर भगवान के दर्शन कर स्वयं को धन्य मानते हैं।
